नए साल के लिए एजेंडा
एजेंडा हमेशा दो चीज़ों की बुनियाद पर बनता है— माज़ी (बीते हुए कल) का तजुर्बा और हाल व मुस्तक़बिल के इमकानात (opportubities)। इन दोनों पहलुओं को देखते हुए मुसलमानों का एजेंडा यह होना चाहिए कि वे माज़ी की ग़लतियों को दोबारा न दोहराएँ और नए इमकानात को जानकर उन्हें बख़ूबी तौर पर इस्तेमाल करें।
इस एतिबार से ग़ौर कीजिए, तो हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए पहला काम यह है कि वे नेगेटिव (negative) तर्ज़-ए-फ़िक्र को हमेशा के लिए छोड़ दें और पूरी तरह मुसबत (positive) तर्ज़-ए-फ़िक्र को इख़्तियार कर लें। दौर-ए-अव्वल के मुसलमानों ने जो बे-नज़ीर कामयाबी हासिल की, उसका सबसे बड़ा राज़ यह था कि उनमें का हर फ़र्द मुकम्मल मअनों में मुसबत सोच का मालिक था। वह क़ुरआन के मुताबिक़ ‘उस्र में युस्र’ (94:5-6) का पहलू तलाश कर लेता था। वह बज़ाहिर शिकस्त के वाक़ये में फ़त्ह का राज़ दरियाफ़्त कर लेता था।
दूसरे ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माने में 14 हिजरी में ईरान फ़त्ह हुआ। फ़त्ह से पहले का वाक़या है। ईरान के शहनशाह यज़्दगर्द ने मुस्लिम लश्कर के सरदार साद बिन अबी वक़्क़ास को पैग़ाम भेजा कि बातचीत के लिए अपना सफ़ीर भेजें। चुनाँचे मुसलमानों का एक वफ़्द ईरानी शहनशाह यज़्दगर्द से गुफ़्तगू के लिए उसके दरबार में गया। किसी बात पर यज़्दगर्द नाराज़ हो गया और उसने मुस्लिम डेलीगेशन की बेइज़्ज़ती के लिए उनके एक रुक्न आसिम बिन अम्र के सिर पर मिट्टी का टोकरा रखवाकर वापस कर दिया। वे अपने सिर पर मिट्टी का टोकरा लिये हुए साद बिन अबी वक़्क़ास के पास पहुँचे, मगर हज़रत साद ने इसे नेगेटिव तौर पर नहीं लिया, बल्कि यह कहा कि तुम्हें ख़ुशख़बरी हो— “ख़ुदा की क़सम, अल्लाह ने हमें उनके इक़्तिदार की कुंजियाँ दे दीं।”
أَبْشِرُوا فَقَدْ وَاللهِ أَعْطَانَا اللهُ أَقَالِيدَ مُلْكِهِمْ.
तारीख़ बताती है कि मुस्लिम सल्तनत हर रोज़ तरक़्क़ी करती गई और ईरानी सल्तनत सिमटती चली गई।
(अल-बिदाया व अल-निहाया, जिल्द 9, सफ़्हा 628)
यही इस्लाम की तालीम है कि ‘उस्र में युस्र’ देखो— नेगेटिव वाक़ये में भी मुसबत पहलू तलाश करो।
इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे शऊरी तौर पर, न कि मजबूरी के तहत, नेगेटिव सोच और नेगेटिव बोली को मुकम्मल तौर पर तर्क कर दें। वे शऊरी फ़ैसले के तहत मुसबत तर्ज़-ए-फ़िक्र को पूरी तरह अपना लें।
मौजूदा दौर की सबसे अच्छी अलामत यह है कि मॉडर्न आर्थिक इनफ़िजार (explosion) ने दुनिया के सियासी, मआशी और समाजी हालात को पूरी तरह से बदल दिया है। इस तब्दीली का सबसे ज़्यादा पुर-उम्मीद पहलू यह है कि हर क़िस्म के मौक़े हर एक के लिए ला-महदूद हद तक खुल गए हैं। इसकी एक अलामत यह है कि जुमे और ईद के मौक़े पर मस्जिदों के सामने कारों की भीड़ लग जाती है और ठेले वालों की जेब में स्मार्ट फ़ोन बजकर यह ऐलान करता है कि मआशी मौक़े अब इतने ज़्यादा बढ़ गए हैं कि ख़ास से लेकर आवाम तक हर एक को इसका फ़ायदा पहुँच रहा है। इसी तरह सियासी और समाजी शोबों में भी हालात पूरी तरह बदल गए हैं।
इन तब्दीलियों का पहला नतीजा यह हुआ है कि मुसलमानों के लिए अब दुनियावी तरक़्क़ी के एतिबार से सुरक्षा या हिफ़ाज़त का कोई मसला बाक़ी नहीं रहा। अब मुसलमानों को सिर्फ़ यह करना है कि वे नए हालात और नए मौक़ों को पहचानें और अपने अंदर वह सलाहियत पैदा करें, जिनके ज़रिए वे नए मौक़ों को इस्तेमाल कर सकें। तमसील की ज़बान में यह कहा जा सकता है कि बारिश हो चुकी है। अब किसी किसान को सिर्फ़ उसकी बे-अमली ही महरूम रख सकती है— दुरुस्त मंसूबा-बंदी के साथ अमल करने वाले किसान के लिए अब महरूमी का कोई सवाल नहीं। यहाँ इस सिलसिले में चंद ज़रूरी पहलुओं की तरफ़ इशारा किया जाता है—
1. नए हालात ने अंग्रेज़ी ज़बान और कंप्यूटर लिटरेसी की अहमियत बहुत ज़्यादा बढ़ा दी है यानी इंफ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी। अब तरक़्क़ी के लिए अंग्रेज़ी ज़बान और कंप्यूटर लाज़िमी हो चुके हैं। दारुल उलूम देवबंद ने इस अहमियत को महसूस किया और अपने यहाँ अंग्रेज़ी और कंप्यूटर का कोर्स बाक़ायदा तौर पर जारी कर दिया। मैं समझता हूँ कि मुल्क के तमाम मदरसों और दीनी इदारों को बिला-ताख़ीर ऐसा ही करना चाहिए।
2. अब तक मुस्लिम नौजवानों में यह रुझान रहा है कि वे ज़्यादातर आर्ट साइड (Humanities) में दाख़िला लेकर पढ़ते थे। यह रुझान अब ज़माने के ख़िलाफ़ रुझान बन चुका है। आर्ट साइड में बी.ए. और एम.ए. करने के मआशी एतिबार से अब बहुत कम फ़ायदा रह गया है। मुस्लिम नौजवानों को अब बिला-ताख़ीर यह करना है कि वे अंग्रेज़ी ज़बान और टेक्निकल सब्जेक्ट्स में अच्छी लियाक़त पैदा करें। ख़ुशक़िस्मती से आजकल हर जगह इसकी सहूलियतें पैदा हो गई हैं। मुस्लिम नौजवानों को इन सहूलियतों से भरपूर फ़ायदा उठाना चाहिए।
3. यह एक आम मुशाहिदा है कि मुसलमान शादियों में और दूसरी तक़रीबात में बहुत ज़्यादा खर्च करते हैं।
इस क़िस्म का खर्च फ़िक्री पस-मांदगी की अलामत है। क़दीम ज़माने में जब खर्च के ज़राए बहुत महदूद थे, तो लोग शादियों और तक़रीबात में अपना पैसा खर्च किया करते थे। अब पैसे के इस्तेमाल के दूसरे ज़्यादा वसीअ और तामीरी ज़राए वजूद में आ चुके हैं। मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने पैसे को जदीद तामीरी कामों में खर्च करना सीखें। मसलन— आला मेयार के स्कूल, ट्यूशन ब्यूरोज़, प्रोफेशनल ट्रेनिंग सेंटर, टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स वग़ैरह।
4. मौजूदा ज़माने में हर चीज़ का मेयार बदल गया है। मसलन— पिछले दौर में ख़ानदानी मंजन की अहमियत हुआ करती थी। अब साइंटिफ़िक तरीक़ों से बनाए हुए टूथपेस्ट ने अहमियत इख़्तियार कर ली है। पिछले दौर में शाही नुस्ख़े बड़ी चीज़ समझे जाते थे। अब सारी अहमियत साइंटिफ़िक फ़ॉर्मूले की हो गई है। पहले ज़माने में बैलगाड़ी लोहे के धुरे पर चलती थी, अब गाड़ियाँ बॉल बेयरिंग के ऊपर दौड़ती हैं। मुसलमानों को चाहिए कि ज़माने की इस तब्दीली को समझें और नई टेक्नीक को सीखकर हर मैदान में आला तरक़्क़ी हासिल करें।
5. 1947 के बाद मुख़्तलिफ़ अस्बाब से मुसलमान रिज़र्वेशन को अपने लिए कामयाबी का ज़रिया समझते थे। जदीद हालात ने सारी अहमियत कॉम्पटिशन को दे दी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब रिज़र्वेशन की बात एक ख़िलाफ़-ए-ज़माना नारा बन चुका है। अब मुसलमानों को चाहिए कि वे अपनी मिल्ली डिक्शनरी से रिज़र्वेशन का लफ़्ज़ निकाल दें और सारी तवज्जोह मेहनत और मंसूबा-बंदी पर लगाएँ। मौजूदा ज़माने में यही तरक़्क़ी का वाहिद रास्ता है।
6. 1947 के बाद मुसलमानों में सियासी एतिबार से नेगेटिव पॉलिसी का तरीक़ा राइज हो गया। यह तरीक़ा मुस्तक़िल मिल्ली मफ़ाद के लिए सख़्त घातक है। वह जम्हूरी तक़ाज़ों के सरासर ख़िलाफ़ है। मुसलमानों को चाहिए कि वे पॉज़िटिव सियासी पॉलिसी को इख़्तियार करें। यही मौजूदा ज़माने में उनके लिए कामयाबी का वाहिद रास्ता है।
7. इंतिख़ाबी पॉलिसी के मामले में मुसलमानों को अपना ज़ेहन मुकम्मल तौर पर बदलना है। अब तक उनका रुझान इस मामले में यह रहा है कि पूरे मुल्क के लिए एक मिल्ली पॉलिसी इख़्तियार करें। मौजूदा हालत में इस क़िस्म की इंतिख़ाबी पॉलिसी मुसलमानों के लिए मुफ़ीद नहीं। मुफ़ीद सियासी पॉलिसी सिर्फ़ यह है कि मुसलमान मकामी हालात के एतिबार से अलग-अलग अपनी इंतिख़ाबी पॉलिसी बनाएँ। वे मुल्की पॉलिसी का तरीक़ा ख़त्म कर दें।
8. 1947 के बाद से मुसलमानों के ऊपर तहफ़्फ़ुज़ाती ज़ेहन ग़ालिब रहा है। वे मिल्ली शनाख़्त के तहफ़्फ़ुज़ को सबसे बड़ी चीज़ समझते रहे हैं। मौजूदा ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में इस क़िस्म की तहफ़्फ़ुज़ाती पॉलिसी ग़ैर-मुफ़ीद है। मुसलमानों के लिए सही पॉलिसी यह है कि वे मिल्ली शनाख़्त को अपना कंसर्न बनाने के बजाय पैग़ाम-ए-ख़ुदावंदी को तमाम इंसानों तक पहुँचाने को अपना निशाना बनाएँ। वे मुल्क में ‘देने वाले’ (giver) गिरोह की हैसियत से अपना मुक़ाम हासिल करने की कोशिश करें।
9. मॉडर्न ज़माने की ख़ुसूसियात में से एक ख़ुसूसियत यह है कि उसने मेल-मिलाप और इख़्तिलात (interaction) को बहुत ज़्यादा बढ़ा दिया है। यह तब्दीली तरक़्क़ियाती सरगर्मियों से बहुत ज़्यादा जुड़ी हुई है। ऐसी हालत में अब ‘अलाहिदा मुस्लिम पॉकेट’ का तसव्वुर एक पुराना तसव्वुर बन चुका है। अब मुसलमानों को ‘अलाहिदा मुस्लिम पॉकेट’ जैसी पॉलिसी को मुकम्मल तौर पर ख़त्म कर देना चाहिए। मॉडर्न ज़माने में तरक़्क़ी के आला मुक़ाम पर पहुँचने के लिए यह बेहद ज़रूरी है।
10. पिछले सौ साल से भी ज़्यादा मुद्दत से पूरी दुनिया के मुसलमानों ने अपनी आफ़ाक़ियत (universality) को मिल्लत तक महदूद कर रखा है। मॉडर्न ज़माने का तक़ाज़ा है कि वे इस महदूदियत को ख़त्म कर दें। वे अपनी आफ़ाक़ियत को पूरी इंसानियत के साथ जोड़ें। वे जदीद इस्तिलाह के मुताबिक़ अपने आपको ‘ग्लोबल विलेज’ का एक हिस्सा समझें। वे बैनुल-मिल्ली (intra-nation) सियासत के बजाय बैनुल-इंसानी सियासत को इख़्तियार करें। इसी आफ़ाक़ियत में उनकी दीनी और मिल्ली तरक़्क़ी का राज़ छुपा हुआ है।
इस सिलसिले में सबसे ज़्यादा अहम बात यह है कि मौजूदा ज़माना मंसूबा-बंदी के साथ काम करने का ज़माना है। न सिर्फ़ हिंदुस्तानी मुसलमान, बल्कि सारी दुनिया के मुसलमान मौजूदा ज़माने में मंसूबा-बंदी के साथ काम करने में नाकाम रहे हैं। इसका बुनियादी सबब यह है कि मंसूबा-बंदी अमली इमकानात को सामने रखकर की जाती है, जबकि मुसलमानों का हाल यह है कि वे सिर्फ़ अपने जज़्बात को जानते हैं। वे अपने जज़्बात और उमंगों की बुनियाद पर अपने अमल का नक़्शा बनाते हैं। अपने इस मिज़ाज की बिना पर वे जज़्बाती इक़दाम तो बहुत करते हैं, मगर मंसूबा-बंद अमल में वे नाकाम रहते हैं। मुसलमानों को अपने इस मिज़ाज को बदलना होगा। अगर उन्होंने अपने इस मिज़ाज पर क़ाबू न पाया, तो मुस्तक़बिल में भी वे उसी तरह नाकामी की मिसाल क़ायम करेंगे, जिस तरह वे माज़ी में नाकामी की मिसालें क़ायम करते रहे हैं।
मौजूदा मुसलमानों को अगर मुझे एक मशवरा देना हो, तो मैं कहूँगा कि जज़्बाती कार्रवाइयों से बचिए और सोचे-समझे अमल का तरीक़ा इख़्तियार कीजिए और फिर कामयाबी आपके लिए उतनी ही यक़ीनी बन जाएगी, जितनी आज की शाम के बाद कल की सुबह सूरज का निकलना।
