पीसफ़ुल एक्टिविज़्म, वायलेंट एक्टिविज़्म
एक हदीस-ए-रसूल इन अल्फ़ाज़ में आई है—
” عَنْ عَائِشَةَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: إِنَّ اللهَ رَفِيقٌ يُحِبُّ الرِّفْقَ، وَيُعْطِي عَلَى الرِّفْقِ مَا لَا يُعْطِي عَلَى الْعُنْفِ، وَمَا لَا يُعْطِي عَلَى مَا سِوَاهُ। “
(सहीह मुस्लिम, हदीस नंबर 2593)
यानी नबी ﷺ की ज़ौजा हज़रत आयशा बयान करती हैं कि पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने कहा: “बेशक अल्लाह नरम है, और नरमी को पसंद करता है, और नरमी पर वह सब कुछ अता करता है, जो वह सख़्ती पर अता नहीं करता, और न इसके अलावा किसी और चीज़ पर अता करता है।”
एक रिवायत में यह इज़ाफ़ा है:
“وَيَرْضَاهُ، وَيُعِينُ عَلَيْهِ مَا لَا يُعِينُ عَلَى الْعُنْفِ”
यानी अल्लाह तआला नरमी से राज़ी होता है, और नरमी पर वह जिस तरह मदद करता है, ऐसी मदद वह सख़्ती पर नहीं करता।
(अल-मुअज़मुल कबीर लित-तबरानी, हदीस नंबर 852)
यह हदीस तरीक़-ए-कार के बारे में है। इसका मतलब यह है कि अल्लाह की मदद हमेशा पुर-अमन तरीक़-ए-कार पर आती है। हिंसात्मक तरीक़-ए-कार पर अल्लाह की मदद नहीं आती है। मज़ीद ग़ौर व फ़िक्र से मालूम होता है कि जब इंसान पुर-अमन अंदाज़ में अपना काम करता है, तो फ़ितरत के क़वानीन इंसान के मुवाफ़िक़ बन जाते हैं। इंसान को अपने काम में फ़रिश्तों की मदद हासिल हो जाती है। जब इंसान टकराव का रास्ता अपनाता है, तो ऐसा नहीं होता। टकराव का रास्ता हमेशा रिएक्शन पैदा करता है। इसके बरअक्स, पुर-अमन रास्ता रिएक्शन को ख़त्म कर देता है।
अल्लाह तआला नरमी को पसंद करता है, वह सख़्ती को पसंद नहीं करता। इसका सबब यह है कि नरमी या पुर-अमन तरीक़-ए-कार इख़्तियार करने की सूरत में मसला हल होता है, जबकि तशद्दुद का तरीक़ा इख़्तियार करने की सूरत में मसला हमेशा बढ़ जाता है। पीसफ़ुल तरीक़-ए-कार इख़्तियार करने का नतीजा यह होता है कि कोई नया मसला पैदा हुए बग़ैर मसला हल हो जाता है। इसके बरअक्स, तशद्दुद का तरीक़ा इख़्तियार करने की सूरत में कोई मसला हल नहीं होता। अलबत्ता नए-नए मसाइल पैदा होकर मक़सद के हुसूल को और ज़्यादा मुश्किल बना देते हैं।
