इंशा अल्लाह
इस्लाम की तालीमात में से एक तालीम यह है कि आदमी जब किसी काम के बारे में अपने इरादे का इज़हार करे, तो उसके साथ इंशा अल्लाह भी ज़रूर कहे (अल-कह्फ़, 18:23)। मसलन, एक शख़्स दिल्ली से बंबई जाने का इरादा करता है, तो वह इस तरह न कहे कि “कल मैं बंबई जाऊँगा”, बल्कि यूँ कहे कि “इंशा अल्लाह कल मैं बंबई जाऊँगा।”
यह कलिमा गोया इस हक़ीक़त-ए-वाक़िआ का एतिराफ़ है कि मेरी चाह सिर्फ़ उस वक़्त पूरी होगी, जबकि अल्लाह की चाह भी उसमें शामिल हो जाए। यह अपने चाहने में अल्लाह के चाहने को मिलाना है, अपने इरादे के साथ अल्लाह के इरादे को शामिल करना है। असल यह है कि इंसान इरादा करता है और उसके मुताबिक़ कोशिश करता है। मगर किसी कोशिश की तकमील सिर्फ़ उस वक़्त मुमकिन होती है, जब उसके साथ अल्लाह की रज़ामंदी भी शामिल हो जाए। इसी को अरबी में इस तरह कहा गया है कि कोशिश मेरी तरफ़ से है और उसकी तकमील अल्लाह की तरफ़ से है। इस एतिबार से ख़ुदा और बंदे का मामला गोया कोगवील (cogwheel) का मामला है। एक पहिया ख़ुदा का है और दूसरा पहिया इंसान का। जब दोनों के दन्त-चक्र एक-दूसरे में मिल जाते हैं, उसके बाद ज़िंदगी की मशीन चल पड़ती है। इंसान अगर ऐसा करे कि ख़ुदा के पहिए से अलग होकर अपना पहिया चलाना चाहे, तो ब-ज़ाहिर हरकत के बावजूद वह बेफ़ायदा होगा। क्योंकि पूरी मशीन के चलने के लिए ज़रूरी था कि ख़ुदा के पहिए का दन्त (फ़ितरत का क़ानून) भी इंसान के पहिए के साथ शामिल हो।
इंशा-अल्लाह का कलिमा ब-एतिबार-ए-हक़ीक़त एक दुआ है। इसका मतलब यह है कि इंसान अपने काम का आग़ाज़ करते हुए अल्लाह तआला से दरख़्वास्त करता है कि वह इंसान के काग (दन्त-चक्र) में अपना काग (दन्त-चक्र) मिला दे, ताकि ज़िंदगी की मशीन चल पड़े और अपने मतलूब अंजाम तक पहुँच जाए। इंशा-अल्लाह कहना गोया ज़िंदगी के सफ़र में मालिक-ए-कायनात को अपने साथ लेना है। और जिस आदमी का यह हाल हो कि ख़ुद मालिक-ए-कायनात उसका हमसफ़र हो जाए, उसको मंज़िल तक पहुँचने से कौन रोक सकता है।
