ईद-उल-अज़हा का सबक
ईद-उल-अज़हा की क़ुर्बानी का हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी से बराए-रास्त ताल्लुक़ है। हज़रत इब्राहीम की ज़िंदगी से यह सबक़ मिलता है कि जब एक तरीक़ा नतीजा-ख़ेज़ साबित न हो रहा हो तो अपने मंसूबे की री-प्लैनिंग करनी चाहिए। मसलन, पैग़म्बर इब्राहीम ने उर (मौजूदा इराक़) से अपने पैग़ाम का आग़ाज़ किया। मगर जब वहाँ उनको कामयाबी नहीं मिली, बल्कि आग में डाल दिया गया, तो हज़रत इब्राहीम ने ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया कि उसको ज़ुल्म के ख़ाने में डालकर शिकायत का तरीक़ा इख़्तियार करें, बल्कि उन्होंने अपने अमल की री-प्लैनिंग की। आख़िरकार इसका नतीजा मक्का की आबादी, और पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ और आपके साथियों के रूप में सामने आया।
ईद-उल-अज़हा दरअसल इस बात का सबक़ है कि अपने अमल की री-प्लैनिंग करो। खोए हुए को हर क़ीमत पर हासिल करने की कोशिश न करो, चाहे उसके लिए क़ुर्बानी की सतह पर अमल करना पड़े। खोए हुए को दुबारा उसी नहज पर पाना मुमकिन नहीं होता। इसलिए मोमिन का काम यह है कि वह कोशिश में नाकामी के बाद हालात का दुबारा मुताला करके अपने अमल की री-प्लैनिंग करे।
री-प्लैनिंग फ़ितरत का एक आम उसूल है। यह हर मामले में लागू होता है, चाहे वह मामला मज़हबी हो या सेक्यूलर। इंसान को हरगिज़ ऐसा नहीं करना चाहिए कि जो तरीक़ा कारगर साबित न हो, उसी को बार-बार आज़माता रहे। इसके बजाए, उसे अपने अमल की री-प्लैनिंग करनी चाहिए। यही इस दुनिया में कामयाबी का वाहिद तरीक़ा है। दरख़्त का मुशाहिदा बताता है कि अगर किसी शाख़ को बढ़ने से कोई चीज़ रोकती है, तो वह अपना रुख़ बदलकर आगे बढ़ने लगती है। ट्रैफ़िक का भी आम उसूल यही है कि जब ड्राइवर देखता है कि आगे रास्ता बंद है, तो वह रास्ता बदलकर अपना सफ़र जारी रखता है।
मक्का में जब पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ के लिए नतीजा-रुख़ी अमल का मौक़ा ख़त्म हो गया, तो अल्लाह तआला ने आपको मदीना की तरफ़ हिजरत का हुक्म दिया। और फिर आहिस्ता-आहिस्ता सारी दुनिया में इस्लाम के लिए रास्ता खुल गया। इसी हक़ीक़त की तरफ़ पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने इशारा किया है:
“मुझे एक बस्ती का हुक्म दिया गया है, वह तमाम बस्तियों को खा जाएगी। लोग उसको यसरिब कहते हैं, लेकिन
वह मदीना है।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नंबर 1748)
