एक दौर का मुशाहिदा
पासपोर्ट के मुताबिक़, मेरी पैदाइश 1 जनवरी 1925 की है। मैंने यह पूरा ज़माना देखा है। इसे तीन दौरों में बाँटा जा सकता है: ब्रिटिश दौर, आज़ादी के बाद का दौर जो बहुत जल्द ग़ैर-काँग्रेसी मुसलमानों का दौर बन गया, और तीसरा दौर, जिसे मुस्लिम नज़रिए से एंटी-बीजेपी दौर कहना सही होगा।
यह तीनों दौर मुस्लिम लीडरों की बहुत-सी कोशिशों और सरगर्मियों के बावजूद बेनतीजा रहे। इन सरगर्मियों का कोई मुसबत नतीजा सामने नहीं आया। अब पूरी उम्मत अमलन उस दौर में है, जिसको ‘ब्लाइंड ऐली’ कहा जा सकता है। मैं अपनी ज़िंदगी के उस मुक़ाम पर हूँ, जहाँ से आगे कोई चौथा दौर देखना शायद मेरे लिए मुक़द्दर नहीं। मेरी अपनी समझ के मुताबिक़, पूरी उम्मत में कोई एक शख़्स भी नहीं, जो ब-ज़ाहिर मुसबत सोच की बुनियाद पर उम्मत की तामीरी मंसूबा-बंदी करे।
ऐसे अफ़राद तो बहुत हैं, जो बड़े-बड़े अल्फ़ाज़ बोलते हैं। लेकिन अगर जायज़ा लिया जाए, तो किसी के पास हक़ीक़ी मानों में कोई लाइन ऑफ़ ऐक्शन नहीं। इनके पास जज़्बाती रद्द-ए-अमल (reaction) होता है, लेकिन इनके पास होशमंदी के साथ किया हुआ कोई मंसूबा नहीं। मैं समझता हूँ कि पूरी उम्मत के लिए अब वह वक़्त आ गया है कि वह क़ुरआन की इस आयत के मुताबिक़ अमल करें, जिसका तर्जुमा यह है: “ऐ ईमान वालो, तुम सब मिलकर अल्लाह के सामने तौबा करो, ताकि तुम कामयाब हो जाओ।” (24:31)
मैं अपने अल्फ़ाज़ में यह कहूँगा कि मुसलमानों को क़ुरआन व हदीस की रोशनी में ग़ौर करना चाहिए। अब वह वक़्त आ गया है कि वह अपने मामले की री-प्लैनिंग करें। री-प्लैनिंग रसूल अल्लाह ﷺ की एक अज़ीम सुन्नत है। इस्लाम के दौर-ए-अव्वल की बे-मिसाल कामयाबी इसी री-प्लैनिंग का नतीजा थी। यह री-प्लैनिंग मुसलमानों की आम सोच के बरअक्स, टकराव के मैदान से हटकर तामीरी मंसूबा-बंदी के मैदान में एनर्जी लगाने की थी। हिजरत-ए-मदीना और सुल्ह-ए-हुदैबिया इसकी रोशन मिसालें हैं। इसी सुन्नत को सामने रखते हुए, आज मुसलमानों को भी चाहिए कि वह टकराव और रद्द-ए-अमल के माहौल से पीछे हटकर तामीरी अमल की तरफ़ मुतवज्जेह हों, न कि बे-फ़ायदा टकराव में अपनी ताक़त ज़ाया करते रहें।
हदीस में है: “इंसान की अच्छी दीनदारी में यह बात शामिल है कि वह ऐसे काम से बचे, जिसका कोई फ़ायदा न हो।”
(जामे-अत-तिर्मिज़ी, हदीस नंबर 2317)
