हासिल-ए-तजुर्बा
मेरी उम्र 66 साल हो गई। अगर मुझे बताना हो कि मेरी पूरी ज़िंदगी के मुताला और तजुर्बे का आख़िरी हासिल क्या है, तो मैं कहूँगा कि—अल्लाह तआला ने इंसान की सूरत में एक मिस्टर नथिंग
(Mr. Nothing) पैदा किया और उसके ऊपर “थिंग” (thing) का परदा डाल दिया।
इंसान के पास ब-ज़ाहिर दिमाग़ है, इल्म है, ताक़त है, असबाब व वसाइल हैं। मगर यह सब का सब ज़ाहिरी परदा है। इस परदे के अंदर दाख़िल होकर देखिए तो मालूम होगा कि इंसान की किसी चीज़ की कोई हक़ीक़त नहीं। इसमें शक नहीं कि इंसान का एक अलैहदा वुजूद है। उसका यह अलैहदा वुजूद दुनिया से लेकर आख़िरत तक बाक़ी रहेगा। इंसान का सारा मामला पूरी तरह अल्लाह की ज़ात पर निर्भर है। दुनिया में भी अगर वह कुछ पाता है, तो वह अल्लाह के दिए से पाता है। और आख़िरत में भी वह जो कुछ पाएगा, अल्लाह के दिए से पाएगा।
इंसान के पास इरादा है, मगर इरादे के मुताबिक़ नतीजा ज़ाहिर करने की उसके अंदर ताक़त नहीं। इंसान के पास फ़िक्र है, मगर हालात पर उसका कंट्रोल नहीं। उसको चाहने का इख़्तियार है, मगर उसको करने का कोई इख़्तियार नहीं। (डायरी, 26 फ़रवरी 1990)
